प्रवासियों पर 'Corona' का कहर - 'Corona' havoc on migrants


भारत में क़रीब 15 करोड़ प्रवासी मज़दूर हैं जो कि अपने गाँव तथा कस्बों से निकल कर बड़े शहरों में नौकरी तथा रोज़गार की तलाश में अपना घर-परिवार छोड़कर रहने को मजबूर हैं। यूँ तो यह एक सोचनीय विषय है कि आख़िर इन श्रमिकों को उनके ही नगर में रोज़गार की ठीक व्यवस्था क्यों नही की जाती, मग़र हमारे देश मे न तो सरकारें और न ही सम्पन्न लोग इन विषयों पर अपना कीमती वक़्त खर्चना चाहते हैं। अतः इस पर बात करना शायद निरर्थक ही है।


दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में covid-19 का पहला मरीज़ पाया गया था। और आज लगभग पूरा विश्व ही इसकी चपेट में आ चुका है। जनवरी और फरवरी माह के इसके शुरुआती दिनों में संक्रमण की गति कम होने के कारण न तो लोगों का और न ही सरकारों का कोई खास ध्यान इस पर गया। फिर मार्च माह में इटली corona की फाँस में आ गया। यह क़रीब 2 लाख कोरोना के मामले मार्च-अप्रैल माह में दर्ज किए गए तथा 30,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। अप्रैल माह में इसका कहर अमेरिका में देखने को मिला जहाँ 1 लाख से ज्यादा लोगों की मौत इसके कारण हुई। भारत की बात करें तो मार्च माह तक यहाँ इसका कोई खास असर नज़र नही आ रहा था, न ही यहाँ की जनता पर और न ही हमारी सरकार पर। लोगों की आवाजाही पर हमारी सरकार द्वारा कोई रोक नहीं लगाई गई थी। जहाँ एक ओर इटली-अमेरिका जैसे देशों में संक्रमण बढ़ रहा था वहीं दूसरी ओर भारत में सरकार इसके आगमन की प्रतीक्षा कर रही थी। ऐसे में संक्रमण का फैलना कोई विस्मयकृत बात नही लगनी चाहिये। बढ़ते संक्रमण मामलों के कारण सरकार द्वारा 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा कर दी गयी। ये 21 दिन फिर बढ़ते-बढ़ते आज लॉकडाउन के 70 दिन बीत चुके हैं मगर फिर भी तेज़ी से बढ़ती संक्रमण दर पर अंकुश लगाना अब तक संभव नही हो सका है।


लॉकडाउन की बात करें तो सरकार का यह निर्णय भारत के ग़रीब तबके और प्रवासी मज़दूरों पर वज्र की तरह गिरा। दिहाड़ी मज़दूरी जैसे काम करके जीवन यापन करने वाले ऐसे लाखों परिवारों का मानो निवाला ही छिन गया। जो श्रमिक मजदूरी करके अपना परिवार चलाने के लिए शहरों में बसे थे उनके सर से तो छत ही छिन गयी, वो बेघर होने की कगार पर आ गए। फिर जैसे जैसे दिन बीतते गए, इनकी मुश्किलें आसमान छूने लगी। न खाने को रोटी बची थी, न रहने को घर था, आखिर ये जाते तो कहाँ जाते। ऐसे में शायद हर व्यक्ति को अपना घर ही याद आएगा। सो वे भी सरकार से गुहार लगाते रहे कि या तो उन्हें घर पहुचाने का इंतेज़ाम कराया जाए या फिर सरकार यदि उन्हें 1 वक्त का भोजन ही मुहैया करा देती तो वे ख़ुशी ख़ुशी रह लेते। मगर सरकारों को भी राजनीति से फुर्सत कहाँ होती है! जब दिन बीतते रहे और सरकार की ओर से कोई खास मदद नही मिली तो करोड़ों मजदूरों को 'आत्मनिर्भर' बनना पड़ा। उन्होंने पैदल ही अपना मिलों का सफर तय करने का फैसला कर लिया। इनमें से कई मज़दूर उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे। कोई मुंबई से पैदल चल दिया तो कोई दिल्ली से। कई संस्थाओं ने और कई लोगों ने जितना बन पड़ा इनकी मदद की, मगर फिर भी लाखों ऐसे थे जो भूख-प्यास से झुझते हुए चले जा रहे थे।


क़रीब 750 ऐसे ग़रीब लोगों की मौत महज लॉकडाउन के कारण हो गयी।(source:livemint) इनमें से कुछ भोजन के अभाव से मर गए और कुछ सफर में चलते-चलते। पर इनकी मौत का ज़िम्मेदार आखिर कौन है? आखिर क्यों सरकार ने इन सभी को घर पहुचाने का इंतेज़ाम वक्त रहते नही किया? नोटबन्दी की तरह ही आधी रात से लॉकडाउन का ऐलान कर दिया हमारी सरकार ने अपनी गरीब वर्ग के बारे में सोचे बिना। आखिर यह किस प्रकार का शासन है जिसमें निचले स्तर के तबके की फिक्र नही की जाती, उनके लिए ठोस काम नही किया जाता। यह बिल्कुल साफ है की हमारी सरकारों को इनकी कितनी परवाह है। जिस तरह नोटबन्दी का निर्णय तो सही था मगर उसको ले कर केंद्र सरकार द्वारा कोई तैयारी बिल्कुल नही थी और उसका परिणाम सारा देश देख चुका है ठीक उसी तरह लॉकडाउन के सही कदम तो था मगर हमारी केंद्र सरकार इसे ठीक प्रकार से निष्पादित करने में अक्षम साबित हुई और इसका खामियाजा एक बार फिर गरीब जनता को भुगतना पड़ा। आज इन श्रमिकों को घर पहुचाने के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही, शायद यही काम सरकार ने लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में किया होता तो बात आज कुछ और होती। जो 750 परिवार बिखरे हैं वे शायद आज सरकार के शुक्रगुज़ार होते। अतः इन मौतों का ज़िम्मेदार सरकार की अक्षम नीतियां हैं? विचार करें।

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